Tuesday, September 13, 2016

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 समाचार

संस्कृत बोलने वाला दुर्लभ गांव जहाँ हर घर में इंजिनियर हैं  (news- Sanskrit  speaking village of India, with many engineers)

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Sanskrit is believed to be a logical and spiritual language. It is also called as devbhasha  (language of God).     

तुंगा नदी के तट पर मत्तुर / माथुर ग्राम ( कर्नाटक राज्य, भारत, सामान्य भाषा कन्नड़ ) में बोलचाल के लिये  संस्कृत का  उपयोग किया जाता है. एक और अद्भुत बात है, जिन प्राचीन ग्रंथो को आज़ हम भूल रहे हैं. उन्हे   यहाँ के पारम्परिक विध्यालय में पढाते  है. इस गांवों में हर घर में इंजिनियर हैं. मान्यता है संस्कृत देव भाषा है और इस के  अध्ययन से आध्यात्मिकता  और तार्किकता बढती है.    

तब क्या संस्कृत को एक मृत भाषा कहना भ्रामक नहीं है?


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पापा की गर्ल फ्रेंड (कहानी ) 


                     वीणा  अपनी बीमार सहेली से मिल कर वापस लौट रही थी. वह अस्पताल के कारीडोर से गुजर रही थी. तभी उसकी नज़र सामने  के अधखुले द्वार से, कमरे के अंदर चली  गई.  नर्स  द्वार खोल कर बाहर निकल रही थी. बिस्तर पर लेटे बीमार का चेहरा  परिचित लगा. वह आगे बढ़ गई. फ़िर अचानक ठिठक कर रुक गई. दो पल कुछ सोचती रही. फ़िर पीछे मुड़ कर नर्स को धीमी आवाज़ में पुकारा.

                     नर्स ने  जब पेशेंट का नाम बताया.  तब उसका रहा सहा शक भी दूर हो गया. विनय चाचा उस के  पापा के करीबी दोस्त थे. थोड़ी उधेड़बुन के बाद वह धीरे से द्वार खोल कर कमरे में चली गई. चाचा ने आहट  सुन  आँखे खोली. आश्चर्य से उसे देख कर पूछ बैठे -“बीनू , तुम….? यहाँ कैसे ?  कितने सालों बाद तुम्हें देख रहा हूँ. कैसी हो बिटिया ? अभी भी मुझ से नाराज़ हो क्या ?  चाचा और उनका बेटा राजीव उसे हमेशा इसी नाम से बुलाते थे. कभी पापा के बाद विनय चाचा ही उसके आदर्श थे. आज़ उन्हे ऐसे कमजोर, अस्पताल के बिस्तर पर देख वीणा की आँखें भर आईं.

                              ढेरो पुरानी यादें अलग-अलग झरोखों से झाँकने लगीं. पुराने दिन आँखों के सामने सजीव हो उठे. पापा और चाचा के  सुबह की सैर,  फिर उनकी चाय की चुस्कियाँ, रात में दोनों का क्लब में ताश खेलना और  गपशप,  दोनों परिवार का एक साथ पिकनिक और सिनेमा जाना. इन सब के साथ एक और सलोना चेहरा उस की यादोँ की खिड्कियाँ  खट्खटाने लगा.

                 नन्हे  राजीव और वीणा की पढाई एक ही स्कूल से शुरू हुई थी. पहले हीं दिन वीणा स्कूल की सिढियोँ पर गिर गई थी. उस दिन से राजीव रोज़ उसकी ऊँगली थाम कर स्कूल ले जाता. दोनों  के ममी-पापा नन्हें राजीव और नन्ही वीणा को एक दूसरे का  हाथ थामे देख हँस पड़ते. चाकलेट के लिये हुए  झगड़े में अक्सर वीणा, राजीव की कलाई में दाँत काट लेती.

                         उस दिन वीणा अपना दूध का दाँत मिट्टी में दबाने हीं वाली थी, तभी राजीव उसके हाँथों से दाँत छिनने लगा.  सभी हैरान थे. पूछ्ने  पर, वह ऐसा क्यों कर रहा है? राजीव ने कहा – “ मैं  इस दांत को कौवे को दिखा दुँगा. तब वीणा का  नया  दाँत नहीं  निकलेगा. ममी ने कहा है,  दूब  के नीचे दाँत मिट्टी में दबाने से जैसे-जैसे दूब बढेगा वैसे हीं नया  दाँत जल्दी से निकल आयेगा. अगर कौवे ने  दाँत को देख लिया तब वह  दाँत कभी नहीं निकलेगा. वीनू  मुझे बहुत  दाँत काटती है, इसलिये …….. ”  सभी का हँसते-हँसते बुरा हाल था. ऐसे हीं बचपन से बड़े होने तक दोनों का लड़ना झगड़ना , खेल कूद सभी साथ होता रहा. पता ही नहीँ चला समय कब फिसलता हुआ निकल गया.

                   दोनों बच्चे बड़े हो गये. दोनों बच्चे  कब एक दूसरे को नई नज़रों से देखने लगे.  उन्हें भी समझ नहीँ आया. बचपन से दोनों घर-घर खेलते बारहवीं में पहुँच कर सचमुच घर बसाने का सपना देखने  लगे. बारहवीं  में दोनों अच्छे अंको से पास कर अपने सपने सजाने लगे थे. उस दिन बिनू कालेज से दो एडमिशन फार्म ले कर उछ्लती-कुदती राजीव का फार्म देने उसके घर पहुची. बाहर हीं विनय चाचा खडे थे. उन्हों ने थोडी रुखी  आवाज़ में उसके  आने का कारण पूछा. फिर गुस्से से बोल पडे – “ राजीव घर में नहीं है. दिल्ली गया हुआ है. वह  अब यहाँ नहीं  पढेगा.  विदेश जा रहा है अपनी मौसी के पास. आगे की पढाई वहीं करेगा. तुम अब यहाँ मत आया करो.”  

                    विनय चाचा का वह रुखा व्यवहार उसके दिल में चुभ गया. पर उससे ज्यादा चुभन हुई थी. राजीव का  उसे  बिना बताये, बिना मिले चले  जाने से. वह टूटे दिल और  आँसू भरी आँखों  के साथ वापस लौट आई. कुछ हीं महीनों में एक अच्छा रिश्ता आया और उसकी शादी हो गई. ना जाने क्यों शादी में भी विनय चाचा- चाची नहीं आये.

                          शादी के बाद वीणा अपनी जिंदगी में खुश थी. बच्चे और पति के साथ जिंदगी बहुत खुशगवार थी. पर कभी-कभी पुरानी यादें उसके दिल में कसक पैदा करती. विनय चाचा को वह कभी माफ नहीं कर पाई. राजीव के व्यवहार से भी आहत थी. अक्सर सोंचती, उसने ऐसा क्यों किया? कभी खत भी  तो लिख सकता था. अपनी  मज़बूरी  बता सकता था. इस बात के रहस्य को वह सुलझा नहीं पाती.    

                 आज़ अचानक विनय चाचा को देख उसकी दिल कर रहा था,  उन्हें अपने गिले-शिकवे और उलाहना सुनाने का. तभी दरवाज़े पर हुई आहट से उसने नज़रें उठाईं. सामने  दो प्यारी-प्यारी किशोरियों के साथ एक सुंदर महिला खडी थी.  जब विनय चाचा ने उनका  परिचय राजीव की पत्नी और बेटियों के रुप में कराया. तब वह थोडा असहज हो गई और झट  जाने के लिये खडी हो गई.

          राजीव की पत्नी ने  उसे गौर से देखा और बडे प्यार से  उसकी कलाईयाँ पकड कर बैठा दिया. वह हँस कर कहने लगी आपके बारे मेँ राजीव और सबों से बहुत कुछ सुना है. अगर आपके पापा ने अंतर जातिय  विवाह को स्विकार कर लिया होता. तब आज़ मेरी जगह आप होतीं.

 

                  सुना है, राजीव और  पापा ने अपनी ओर से बहुत प्रयास किया था.  आपके पापा की नाराज़गी के आगे किसी की ना चली. वीणा ने हैरानी से विनय चाचा को देखा. उन्हों ने सह्मति में सिर हिलाया. वीणा  बोल  पडी – “ मुझे तो किसी ने कुछ नहीं  बताया था. आपने और राजीव ने भी कभी कुछ नहीं कहा.  आज़ तक मैं आपको इन सब का जिम्मेदार मानती रही.”

 

              राजीव की पत्नी बडे ध्यान से उसकी बातें सुन रही थी. वह बोल पडी – “शायद इसे हीं नियति कहते हैं. पापा, आपके पिता की बातों का सम्मान करते हुए अपनी मित्रता निभा रहे थे. पुरानी बातों को भूल, आपको और राजीव को भी  मित्रता निभानी  चाहिये.” उसकी सुलझी बातें सुन वीणा के मन का आक्रोश तिरोहित हो गया. तभी विनय चाचा बोल पडे –“ बेटी, तुम अपनी घर-गृहस्थी में खुश हो. यह मुझे मालूम है. मैं तुम्हारे पापा से मालूम करता रहता था. तुम मेरी  बेटी हो ना ?”

    

                              दोनों किशोरियाँ कुछ समझ नहीं पा रहीं थीं. छोटी बेटी ने धीरे से अपनी माँ के कान में पूछा  – ये कौन हैं मम्मी ?  राजीव की पत्नी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई. उसने हँसते हुए कहा – तुम्हारे पापा की फ्रेंड … ….गर्लफ्रेंड है. वीणा के चेहरे पर भी तनाव रहित  मुस्कान नाच उठी.   


POSTED INहिन्दी कविता

वह कौन है? 

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वह कौन थी?

जिन्दगी में उलझी-उलझी 

सब कुछ सुलझाने की कोशिश में,

बहुत कुछ झेलती हुई

जिन्दगी के सैकङो रंगों से खेलती हुई

           खङी

कुछ परेशान, कुछ हताश,

फिर भी हँसती सी।

वह कौन है?

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                                                    नारी


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POSTED INनारी, हिन्दी कविता GENDER DIFFERENCE, 

अभिमन्यु की तरह (कविता) poem of an unborn baby


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चक्रव्यु तोङने वाले ,

अभिमन्यु की तरह सुनती वहाँ,

बाहर की बातें  –

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,

मुझे नहीं पता, मैं कौन हूं?  बेटा या बेटी ?

पर बङे  शुकून से मैं थी वहाँ,

सबसे सुरक्षित, महफूज।

तभी, एक  दिन किसी ने प्रश्न किया  –

          बेटा  है या बेटी ?

आवाज  आई – बेटी !!

धीमा सा  उत्तर आया – नहीं चाहिये, गिरा दो । 



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 poem

Just like Abhimanyu

baby

 just like abhimanyu 

I – unborn baby,

listen to all worldly voices,

People were saying – 

Save girl child, educate them..…

I don’t know wether I am a girl or boy.

but certainly, 

I am completely safe here.

 One day  

I heard a voice saying – It’s a girl.

somebody whispered,  Remove her …….



Abhimanyu is an important character of the Mahabharat epic. While in his mother’s womb he had heard his father explain the way to break the most difficult chakravyuha.

POSTED INहिन्दी कहानीआज की द्रौपदी (कहानी )

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वह हमारे घर के पीछे रहती थी। वहाँ पर कुछ कच्ची झोपङियाँ थीं। वह वहीं रहती थी। कुछ घरों में काम करती थी। दूध भी बेचती थी। लंबी ,पतली, श्यामल रंग, तीखे नयन नक्श अौर थोङी उम्र दराज़। उसका सौंदर्यपुर्ण, सलोना अौर नमकीन चेहरा था। उसकी बस्ती में जरुर उसे सब रुपवती मानते होंगे।

जब भी मैं उधर से गुजरती । वह मीठी सी मुसकान बिखेरती मिल जाती। उसकी मुसकान में कुछ खास बात थी। मोनालिसा की तरह कुछ रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी हमेशा उसके होठों पर रहती। एक बार उसे खिलखिला कर हँसते देखा तब लगा मोनालिसा की मुसकान मेरे लेखक मन की कल्पना है।

एक दिन उसकी झोपङी के सामने से गुजर रही थी। वह बाहर हीं खङी थी। मुझे देखते हँस पङी अौर मजाक से बोल पङी – मेरे घर आ रही हो क्या? मैं उसका मन रखने के लिये उसके झोपङी के द्वार पर खङे-खङे उससे बातें करने लगी। उसका घर बेहद साफ-सुथरा, आईने की तरह चमक रहा था। मिट्टी की झोपङी इतनी साफ अौर व्यवस्थित देख मैं हैरान थी।

एक दिन, सुबह के समय वह अचानक अपने पति के साथ हमारे घर पहुँच गई। दोनों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थीं। पति के अधपके बाल बिखरे थे। उसके कपङे मैले-कुचैले थे। शायद उम्र में उससे कुछ ज्यादा हीं बङा था। पर वह बिलकुल साफ-सुथरी थी। तेल लगे काले बाल सलिके से बंधे थे। बहुत रोकने पर भी दोनों सामने ज़मीन पर बैठ गये।

पता चला, उनका बैंक पासबुक पति से कहीं खो गया था। वह बङी परेशान सी मुझ से पूछ बैठी -“ अब क्या होगा? पैसे मिलेंगे या नहीं ?” दोनों भयभीत थे। उन्हें लग रहा था, अब बैंक से पैसे नहीं मिलेगें। वह पति से नाराज़ थी। उसकी अोर इंगित कर बोलने लगी – “देखो ना, बूढे ने ना जाने “बेंक का किताब” कहाँ गिरा दिया है।” जब उसे समझ आया । पैसे अौर पासबुक दोनों बैंक जा कर बात करने से मिल जायेंगें, तब उसके चेहरे पर वही पुरानी , चिरपरिचित मोनालिसा सी मुसकान खेलने लगी।

उस दिन मैं उसके घर के सामने से गुजर रही थी। पर उसका कहीं पता नहीं था। मेरे मन में ख्याल आया, शायद काम पर गई होगी। तभी वह सामने एक पेंङ के नीचे दिखी। उसने नज़रें ऊपर की। उसकी हमेशा हँसती आखोँ में आसूँ भरे थे। मैं ने हङबङा कर पूछा – “ क्या हुआ? रो क्यों रही हो?”
***

उसका बाल विवाह हुआ था। कम वयस में दो बच्चे भी हो गये। वह पति अौर परिवार के साथ सुखी थी। उसके रुप, गुण अौर व्यवहार की हर जगह चर्चा अौर प्रशंसा होती थी। एक दिन उसका पति उसे जल्दी-जल्दी तैयार करा कर अपने साथ कचहरी ले गया। वहां एक अधेङ व्यक्ति को दिखा कर कहा – अब तुम इसके साथ रहोगी। मैं ने तुम्हें बेच दिया है।“ वह जब रो -रो कर ऐसा ना करने की याचना करने लगी। तब पति ने बताया, यह काम कचहरी में लिखित हुआ है। अब कुछ नहीं हो सकता है।

उसकी कहानी सुन कर , मुझे जैसे बिजली का झटका लगा। मैं अविश्वाश से चकित नेत्रों से उसे देखते हुए बोलने लगी – “ यह तो नाजायज़ है। तुम गाय-बकरी नहीं हो। तुम उसकी जायदाद नहीं । जो दाव पर लगा दे या तुम्हारा सौदा कर दे। उसने तुम से झूठ कहा है। यह सब आज़ के समय के लिये कलकं है।”

       उसने बङी ठंङी आवाज़ में कहा – “ तब मैं कम उम्र की थी। यह सब मालूम नहीं था। जब वह मुझे पैसे के लिये बेच सकता है। तब उसकी बातों का क्या मोल है। अब सब समझती हूँ। यह सब पुरानी बात हो गई।”  मैं अभी भी सदमें से बाहर नहीं आई थी। गुस्से से मेरा रक्त उबल रहा था। आक्रोश से मैं ने उससे पूछ लिया – “ फिर क्यों रो रही हो ऐसे नीच व्यक्ति के लिये।”

उसने सर्द आवाज़ में जवाब दिया – “ आज सुबह लंबी बीमारी के बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके परिवार के लोगों ने खबर किया है । पर तुम्हीं बताअो, क्या मैं विधवा हूँ? मेरा बूढा तो अभी जिंदा है। मैं उसके लिये नहीं रो रहीं हूँ। उसकी मौत की बात से मेरे बूढे ने कहा, अगर मैं चाहूँ, तो विधवा नियम पालन कर सकती हूँ। मैं रो रही हूँ , कि मैं किसके लिये पत्नी धर्म निभाऊँ? मैंने तो दोनों के साथ ईमानदारी से अपना धर्म निभाया है।
उसकी बङी-बङी आँखो में आँसू के साथ प्रश़्न चिंह थे। पर चेहरे पर वही पुरानी मोनालिसा की रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी , जो हमेशा उसके होठों पर रहती थी।



POSTED INकविता अनुत्तरित प्रश्न …(ये है जिन्दगी ?)
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वियतनामी महिला ने १ करोङ ५७ हजार रुपये की बीमा के लिये हाथ-पैर कटवाए (समाचार 26 Aug 2016)

वियतनामी महिला ने १ करोङ ५७ हजार रुपये की बीमा के लिये हाथ-पैर कटवाए। आज के इस समाचार ने दिल दहला दिया। मन में हलचल पैदा हो गई। उसकी ऐसी क्या मजबूरी रही होगी? सिर्फ पैसों के लालच में ऐसा किया या कुछ अौर परेशानी थी ? ये है जिन्दगी ?

हजारों अनुत्तरित प्रश्न ………….